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किस्मत – भाग -1

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मैं रोज की तरह मेट्रो स्टेशन अभी पहुंचा ही था कि सामने से मेट्रो आती दिखी | मैंने जल्दी से अपने कानों में इयरफोन ठूंसा और ट्रेन का दरवाज़ा खुलते ही डब्बे में घुस गया | किस्मत अच्छी थी कि दरवाजे के पास ही एक सीट खाली थी | मैं लपक कर उस पर जा बैठा | मेरे बैठते ही ट्रेन का दरवाजा बंद हुआ और ट्रेन सरपट गति से दौड़ पड़ी | इत्मीनान से बैठने के बाद मैंने जब अपने आस-पास बैठे लोगों को देखा तो पाया कि कुछ लोग या तो चुप-चाप बैठे थे या फिर मेरी तरह कान में इयरफोन लगाए कुछ सुन रहे थे | कुछ नवयुवक मोबाइल पर गेम तो कुछ अपने मोबाइल पर फिल्म देख रहे थे | यह सब देख मुझे लगा कि शायद आज कुछ नया सुनने को नहीं मिलेगा |

मेट्रो अगले स्टेशन पर रुकी तो दो नवयुवतियां अंदर आकर मेरी सीट के पास ही खड़ी हो गईं | वह बहुत ही धीरे-धीरे आपस में बात कर रही थीं | उनकी बातें सुन कर मालूम हुआ कि एक का नाम रेखा और दूसरी का शोभना है और कल ही शोभना का रिश्ता घर वालों ने उसकी मर्जी के खिलाफ़ अपनी ही जाति के किसी लड़के से कर दिया है | जबकि वह किसी और जाति व धर्म के लड़के से प्यार करती है | लेकिन उसके काफ़ी बोलने और विरोध के बावजूद भी उसके घर वालों ने उसकी एक न सुनी | वह दोनों अब आगे क्या किया जाए यह विचार कर रही थीं | इत्फाक से मेरी बगल में बैठे बुजुर्ग दम्पत्ति जैसे ही आने वाले स्टेशन पर उतरने के लिए उठे तो वह दोनों लपक कर उन सीटों पर बैठ गईं | मुझे भी इत्मिनान हुआ कि अब यह दोनों कितनी भी धीरे-धीरे बात क्यों न करें मुझे सुनाई तो पड़ ही जाएगा |

शोभना बैठने के बाद रेखा से बोली ‘तू क्या कहती है ? मुझे अब क्या करना चाहिए’? यह सुन कर रेखा अनमने भाव से बोली ‘अब मैं बोलूं ? ये तो तुम दोनों को ही सोचना है और फ़ैसला करना | वैसे मुझे नहीं लगता है कि प्रवेश इतना हिम्मती लड़का है’ | यह सुन शोभना कुछ तीख़े स्वर में बोली ‘बात अब हिम्मत की नहीं है | अब तो फैसले की है या तो इधर या उधर’ |

‘मैडम इधर या उधर जो भी कुछ करना है वह सब प्रवेश पर निर्भर करता है’, रेखा भी तीखे स्वर में बोली |

शोभना झुंझलाते हुए बोली ‘वो तो है | लेकिन यार मैं सारी रात ठीक से सो नहीं सकी | पता है! रात को मैंने जब प्रवेश को ये सब बताया तो वह परेशान होने की बजाय बहुत ही इत्मिनान से बोला कि मुझे सोचने का कुछ वक्त तो दो | बस उसकी बात सुन कर मेरे तन-बदन में आग लग गई | न चाहते हुए भी मैं उस पर बरस पड़ी कि यह वक्त सोचने का नहीं फैसले का है’ |

रेखा अपने चारों तरफ खड़े यात्रियों को देखते हुए बोली ‘तू अपने परिवार का गुस्सा उस पर क्यों निकाल रही है | ये वक्त लड़ाई-झगड़े का नहीं है’| रेखा को ऐसे चारों तरफ देखते हुए देख शोभना गुस्से में बोली ‘ऐसे चारों तरफ क्या देख रही है | कोई हमारी बातें नहीं सुन रहा है और सुन भी लेगा तो क्या कर लेगा | हम अपनी पारिवारिक बातें कर रहे हैं कोई आशिकी की बातें नहीं कर रहे हैं’, फिर एक लम्बा साँस लेते हुए बोली ‘खैर, मैं मानती हूँ कि मेरी गलती है लेकिन क्या करूँ गुस्सा आएगा तो उसी पर तो निकालूंगी | साला मुझे तो यह समझ नहीं आता कि हम जाति और धर्म की इतनी दुहाई क्यों देते हैं | क्यों हम अपने बच्चों को अपनी झूठी आन-बान-शान की भेंट चढ़ा देते हैं | हम क्यों नहीं समझते कि इंसानियत इन सबसे ऊपर होती है | मेरा क्या कसूर है कि मैं इस घर में और वो उस घर में पैदा हुआ | सिर्फ इस घर में पैदा होना ही तो कसूर है | अगर ऐसा नहीं होता तो हो सकता है हम एक ही जाति और धर्म वाले घर में पैदा होते’ |

रेखा उसकी बात सुन कर ऐसे कंधे उचकाती है जैसे कहना चाह रही हो कि इस समय क्यों बेफिजूल की बातें कर रही है | लेकिन वह यह बोली नहीं और अपने विचारों पर काबू पाते हुए बोली ‘बात तो तुम सही कह रही हो लेकिन अब जो हकीकत है, वो है | इसमें न तुम कुछ कर सकती हो और न वो कुछ कर सकता है | तुम इन बातों को छोड़ कर अब जो हालात हैं उस के बारे में सोचो’ | शोभना रेखा को देख सिर हिलाते हुए बोली ‘क्या सोचूं | वैसे तो वो बड़ी-बड़ी बातें करता है और अब जब बात फैसले की आई है तो कह रहा है कि मुझे सोचने का कुछ समय दो’’ |

‘तू पागल हो गई है क्या ? वो जो भी कह रहा है सही तो कह रहा है | बिना सोचे-समझे इतना बड़ा फैसला कैसे लिया जा सकता है’ ?

‘वो ये भी तो कह सकता था कि मैं तेरे साथ हूँ और सदा रहूँगा | मैं कोई न कोई रास्ता खोजता हूँ’ |

रेखा गुस्से से बोली ‘तू सचमुच ही पागल हो चुकी है | मतलब जो तू सुनना चाहती है वो वही बोले | ये क्या बात हुई | वो भी यही बात तो कह रहा है’ | यह सुन कर शोभना भर्राई आवाज में बोली ‘हाँ ! मैं सचमुच ही पागल हो चुकी हूँ | इधर ये पागल बना रहा है और उधर भाई, चाचा और पापा सब खिलाफ ही नहीं पूरे गुस्से में हैं | इस समय वे कुछ भी कर सकते हैं | कल अगर उन्होंने मेरी नौकरी ही छुड़वा दी तो मैं क्या करुँगी’ |

‘उन्हें क्या पता कि वो तेरी ही कम्पनी में काम करता है’ ?

‘मालूम तो नहीं है लेकिन वो ये भी तो सोच सकते हैं कि मैं बाहर जा कर उससे मिल सकती हूँ’ | यह सुन कर रेखा भी परेशान हो जाती है | वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाती है | कुछ देर चुप रहने के बाद वह शोभना का हाथ पकड़ते हुए बोली ‘बात तो तू ठीक कह रही है | ऐसे मामलों में ज्यादात्तर माँ-बाप शादी होने तक लड़की को घर में ही कैद कर देते हैं | लेकिन तेरा मामला थोड़ा अलग है | तू इतनी पढ़ी-लिखी है और अच्छे-खासे पैसे कमा रही है | तेरा रिश्ता भी तो तेरी नौकरी देख कर ही हुआ होगा | मेरे हिसाब से तेरे घरवाले इस समय ऐसी बेवकूफी नहीं कर सकते | इसलिए इस समय इतना मत सोच | जितना सोचेगी उतना दिमाग खराब होगा | ये समय शांत रह कर सोचने और फ़ैसला करने का है |

शोभना अपना सिर पकड़ते हुए बोली ‘अरे यार मेरे शांत या अशांत होने से क्या फर्क पड़ता है | फैसला तो उसने करना है | कभी लगता है कि वह भरोसेमंद है और कभी लगता है कि वह नहीं है | तू फिर कहेगी कि मैं पागल हो गई हूँ | ऐसी बात नहीं है | बहुत बार ऐसा हुआ है कि जब भी उस पर कोई पारिवारिक या ऑफिस की परेशानी आई है तो उसने पागलों जैसा व्यवहार किया है | वह हमेशा मुसीबत से भाग खड़ा होता है | मैंने उसे सहारा न दिया होता तो वह आज इस शहर में और इस नौकरी में कभी भी सफल न हो पाता | लेकिन जब भी मुझे किसी मुसीबत का सामना करना पड़ा तो उसने भी मेरा काफी साथ दिया है | इसीलिए मैं यह फैसला नहीं कर पा रही हूँ कि वह भाग खड़ा होगा या मेरा साथ देगा’ | यह सुन कर रेखा भी अपना सिर पकड़ कर बैठ जाती है | काफी देर शांत रहने के बाद रेखा धीमे स्वर में बोली ‘तेरी बातें सुन कर तो यही लगता है कि शायद वह तुझे इस मुसीबत में छोड़ कर भाग जाएगा’ |

‘नहीं यार मुझे नहीं लगता कि वो भागेगा | हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं’ |

‘कभी तू उल्टा सोचती है कभी सीधा | जब मैं कहती हूँ कि वह भाग जाएगा तो कहती है नहीं | जब मैं कहती हूँ वो नहीं भागेगा तो कहती है कि वो भाग जाएगा’ |

शोभना सिर पर हाथ मारते हुए बोली ‘कह तो रही हूँ कि मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है | अगर समझ ही आ रहा होता तो फिर तुझे आज क्यों बुलाती | तुझे बुलाने का मतलब ही यही था कि अब तू ही मुझे रास्ता दिखा सकती है’ | रेखा शोभना का हाथ पकड़ते हुए बोली      ‘ऐसे समय में मैं तुझे क्या रास्ता दिखा सकती हूँ | अब तो तुझे जो भी रास्ता दिखा सकता है वह प्रवेश ही है | मैं तो यही कहूँगी कि तू कोई भी जल्दबाजी मत कर, अभी समय है | प्रवेश के साथ भी न तो लड़ाई कर और न ही कोई जोर जबरदस्ती कर | उससे प्यार से बातचीत कर और उसके फैसले का इंतजार कर | जबरदस्ती उससे कुछ भी करवाएगी तो बहुत बड़ी मुश्किल में फंस जाएगी’ |

शोभना हैरान होते हुए बोली ‘वह कैसे’? यह सुन कर रेखा धीमी आवाज में बोली ‘तेरे जोर डालने पर वह न चाहते हुए भी ‘हाँ’ कर सकता है | लेकिन यदि उसकी मर्जी न हुई और वह रास्ते में ही तुझे छोड़ कर भाग गया तो तू न घर की रहेगी और न घाट की | इसलिए उसकी दिली राय से ही चल | अच्छा मेरा स्टेशन आने वाला है मैं उतरती हूँ | मेरी बात का ध्यान रखना और फ़ोन पर मुझे सब बताती रहना | ठीक है’, कह कर रेखा दरवाजे की ओर बढ़ जाती है | आने वाले स्टेशन की घोषणा सुन मुझे भी एहसास हुआ कि मैं भी अपने स्टेशन से चार स्टेशन आगे आ चुका हूँ | मैं भी जल्दी से उठ कर रेखा के साथ ही दरवाजे से बाहर निकल आता हूँ | आज मुझे कहानी तो मिली लेकिन अधूरी ही मिली | यह सोचते हुए मैं वापिसी के लिए दूसरी तरफ के स्टेशन की ओर चल देता हूँ | वापिस आते हुए मैं रास्ते भर अपनी यादशात में रेखा और शोभना का चेहरा बिठाता रहा ताकि जब भी वह मुझे दुबारा मिलें तो मैं उन्हें पहचान पाऊं |